Saturday, January 28, 2017

खुद को बनाने खुदा

उड़ती पतंग का
कब्ज़ा लिया हुआ है
ऊँगली फंसा जो मांझा। ......

हाथों की लकीरें
मिटा चला है
खुद को बनाने खुदा। .......

उड़ती पतंग का
कब्ज़ा लिया हुआ है
ऊँगली फंसा जो मांझा। ......

हाथों की लकीरें
मिटा चला है
खुद को बनाने खुदा। .......
मिला नया बहाना
नाम है गवाना
अब के मौसम
खुद को है पाना


उड़ती पतंग का
कब्ज़ा लिया हुआ है
ऊँगली फंसा जो मांझा। ......

हाथों की लकीरें
मिटा चला है
खुद को बनाने खुदा। .......

मिला नया बहाना
नाम है गवाना
अब के मौसम
खुद को है पाना

आँखों के मंजर
अब है मिटाना
कोरे कागज सा
जहाँ है बसाना
ना कोई जमाना
ना कोई ठिकाना

बहुत सांसे ले चूका मैं
गले बातें भर चूका मैं
इस पूरे जहाँ में
कहीं पूरा ना मैं

फिजायें ना मिली सरफिरी
दुआ कब से है खड़ी

अरे अब मिटा भी दो मुझे
अच्छा चलता हूँ मैं परे

खोने भी दो
खोने भी दो
जाने मुझे
जाने भी दो
जाने भी दो
जाने मुझे
खो......

Thursday, December 8, 2016

मैराथन

दम लगा रे।
दम लगा रे। 
दम लगा ना

आजमाना खुद को
तो लगा ना
- 2

फासला अभी है
पर ज्यादा दूर नहीं है
फासला अभी है

एड़ियों के दम पे
दम लगाना। .....

माथे के ये पसीने
चले फसलों को पीने
हाथों की मुट्ठी खिंचे
आ तू

सीने के ये पतीले
हाँफें, सांसों को खींचे
गर्मी की भाप बन
आ तू

फीतों से है बंधी
दो पैरों की ये जोड़ी
भागें चड़ें दौड़े
ना थामें

गलियां चौराहे
पैरों से हैं सब नापे
जब भी पकड़े सड़क 
ना रुकें

फासला अभी है
पर ज्यादा दूर नहीं है
फासला अभी है

एड़ियों के दम पे
दम लगाना। ....

Wednesday, November 9, 2016

एकांतवास

एक आदमी पर्वत के एकदम नीचे,
पत्थर पे, पत्थर से, पत्थर की भाषा लिख रहा है
लिख रहा है पत्थर को ,
एक पत्थर सी भाषा में।

पत्थर जो अगर काटे जायें,
जोड़े जायें, तो बन सकते हैं ईमारत तक।
कड़े जबड़ों की ईमारत
ईमारत पर्वत सी
जिसे वो पर्वतारोही
चढ़ रहा है
पढ़ रहा है
धीरे धीरे

आज सुबह ही उसने
गरम किया है अपना नाश्ता
पत्थर के चूल्हे पर लकड़ियों से
लकड़िया, जिन्होंने सीखा है
पत्थरों को काट के उगना

वो भी कुछ ऐसा ही सीखना चाहता है
सीख रहा है
उसकी उँगलियों पर पत्थर के स्वाद हैं

पर्वत को चढ़ना
ईमारत को चढ़ने जैसा है
जिसकी आखरी मंजिल तक पहुचना
जिंदगी भर का काम है
मंजिल चोटी है
चोटी तक पहुचने की सनक
सिर्फ पर्वतारोही समझ सकता है

पत्थरों पे पत्थरों से टिकी चोटी
जिसके सारे कोण को समझ कर वो
चढ़ जाना चाहता है
पर्वत को
और महसूस करना चाहता है
एकांत जो इन पत्थरों ने नसीब किया है
एक दूसरे पर चढ़ के
एकांत पत्थर सा

उसने बांध ली है पेटी
जिसका वजन कमर से एड़ी
और एड़ी से जमीन तक फैला हुआ है
वो चढ़ रहा है उस जगह तक
जहाँ जंगल के जानवर
इंसानो से डरते नहीं
वो बोलते रहते हैं अपनी अपनी भाषा
जिन्हें वो समझता नही
वैसे वो अब इंसानो की भाषा भी नहीं समझता
पत्थर की भाषा जो सीख रहा है

वो जानता है पत्थर से पत्थर टकराने की आवाज
आवाज भाषा नहीं है
पतली मिटटी जो पानी संग बह जाएगी
पत्थर की भाषा का पतन है
मट्टी जो बनेगी गेंहू, आटा, आदमी और आदमी की भाषा
पर पत्थर की भाषा नहीं
पत्थर की भाषा
पत्थर में है।

इमारत की आखिरी मंजिल पर बैठा
वो आदमी जानता है की
कितना कठिन है
पत्थरों की इस भाषा को सीखना
इसे सीखने में
उसकी उँगलियाँ जुबान हो चुकी हैं
फेफड़े पतली हवा ले चूल्हे हो चुके हैं
और टखने हो चुके हैं पत्थर

वो चोटी पे बैठा आदमी
देख रहा है दुनिया को दूसरे कोण से
और बोल रहा है
पत्थरों की भाषा
जिसे कोई नहीं सुन सकता
                      समझ सकता






Monday, October 24, 2016

एक सुबह की हताशा

"इस शहर को इन आवारा जानवरों से मुक्त करना चाहिए
बगैर इन्हें हटाये विकास नहीं हो सकता "

एक आवारा कुत्ते की मौत पे कुछ यूँ मातम बनाया गया

उसके गर्दन पे फटे चमड़े से बहते लहू ने
ना जाने कितनों की सुबह बर्बाद की
मगर सबकी नहीं
सामने वाली कोठी में रहते
बूढ़े चाचा स्मृतियों में खो गए
कुत्ते की मौत पे
और याद कर बैठे अपने बचपन के पालतू कुत्ते को
जिसे साप ने डस लिया था
कुल तीन महीने हो चुके है
वो बिस्तर से उठे नहीं हैं
इन्तेजार मे हैं डसे जाने के

अगर ये जानवर जंगल मे मरा होता
तो क्या सब मातम बनाते
या वहाँ भी कोई खुश होता
मुफ्त का गोश्त खाने को

महात्मा का अधूरा आंदोलन

शहर के ऊपर उड़ते पंछी
हर शाम, हर सुबह
निकल आते हैं
महात्मा का अधूरा आंदोलन लिए
एक अहिंसात्मक आंदोलन।

वो उड़ते रहते हैं दिन भर
चहकते, बिलखाते
सुनने वाला शोर का आदि हो चूका है।

वो उड़ते रहते हैं
के कब ये महासमर रुकेगा
कब वो भागता आदमी एक बार ऊपर देखेगा
समर जारी है।

वो दिन में बैठ आते हैं
लंबी इमारतों की खिड़कियों पे
आंदोलन लिए
उस दिन के लिए
जब खिड़की वाला खोलेगा कुण्डी
हवा का रुख देखने
सहानभूति से।

सहानभूति, हाँ! महात्मा वाली सहानभूति
कच्ची मिटटी की सहानभूति
जिसे पकने में मजदूर का श्रम,
सांचो का आकर, भट्टी की आग
और एक लम्बा वक़्त लगता है।

शाम होते ही वो उतर आते हैं
चौराहे पर खड़े अकेले पेड़ पर
जिसके पत्ते दिन की धूल चाट चाट
काले पड़ चुके हैं।

वो उतर आते हैं
रेल के प्लेटफार्म पर
छज्जों के नीचे
छज्जे जो उनके घर नहीं हैं
छज्जे जो पेड़ की छांव नहीं हैं
वो जानते हैं के यहाँ घोसला नहीं बन सकता
बस देह टिकाने की जगह मात्र हैं।

वो जान चुके हैं की
इंसान कब सोता है कब जगता है
इसी लिए उन्हें हमदर्दी है
उस प्लेटफार्म के चौकीदार से
जो कभी नहीं सोता
और बदले में वो उस पर बीट नहीं करते
वो बीट करते हैं उस सफ़ेद कमीज पर
जिसका मालिक सुबह ६ बजे
उठ कर प्लेटफार्म पर ऊंघता रहता है
सोने के लिए।

अहिंसात्मक आंदोलन हमेशा अहिंसात्मक नहीं रहता।




Friday, September 30, 2016

अवसाद में

ए तुम्हे पता है ना
के कितना कुछ बदल जाता है
तुम्हरे बिन

जब दोनों साथ में लेटते हैं
एक दूजे की सांसे चुराते हुए
ज़माने से

अकेले मैं ठंडा पड़ जाता हूँ
जब सांस लुटा आता हूँ
जैसे ठोकर खोये को पुछा नहीं हों किसी ने
कई दिनों से

उधड़े मांस पे फटे निशान
मेरी दिशाएं तुझपे
बढे तापमान सा तेरा लहू
तुम्हे छूना, जिन्दा होना
गर्माहट सा
तुम्हे न छूना जिन्दा हुए जाना
ठण्ड सा

तुमने कुछ टाके थे काटे
मुझपे
लगता है पचपन साल बाद
अगर खो भी दूँ एहसास
याद कर के खुश रहूँगा
काटे हुए वो निशान
अवसाद में

नीला आसमान टेढ़ा हो चूका है
पंछी बवंडर मचा रहे हैं
मेरी पीठ पे झुनझुनी सी है
मेरे पाँव गल से गए हैं
मेरी आँखों की कोख में तुम बैठी हो
नहीं, उम्मीद की तरह नहीं
एक लम्बी रिसती याद सी   

Monday, August 29, 2016

नवाबी

ऐ हुजूर, ओ हुजूर, जी हुजूर
ऐ हुजूर, ओ हुजूर, जी हुजूर


अरे नवाबी , अहा नवाबी , ओहो नवाबी
छाये रे .....

फूल स्पीड में सड़क का गड्ढा कभी नजर ना आवें रे .....

अरे नवाबी , अहा नवाबी , ओहो नवाबी
छाये रे .....

अरे हियँ सट्टावें, हुआँ सट्टावें छुरा नजर ना आवें रे ....

अरे नवाबी , अहा नवाबी , ओहो नवाबी
छाये रे .....

अरे ता था थैया
कभी पासा पहिया
भाई प्यादा भटका जावे रे .....


अरे नवाबी , अहा नवाबी , ओहो नवाबी
छाये रे .....

अरे खुजली मचती जाये रे
अरे तलवा चाटता जाये रे
अरे परफ्यूम नहीं लगाए रे
अरे गंजा मांग बनाए रे
अरे...

अरे क्या ?