Monday, February 9, 2015

भगवान सब देख रहा है

वो बच्चा टुकटुक्की निगाहों से
                        अपने बाप की बद्सलूखी देख रहा था 

मार खाती माँ ने चीख कर कहा
                        पता है  भगवान सब देख रहा है


Friday, February 6, 2015

पिरामिड समाज का

लपेट दो पट्टियों से मुझे
के एक जख्म भी न दिखने पाएं
जो कोई फ़ायदा उठा लेगा

चपेट दो चाहतों में मुझको
के दूसरों की मुस्कान भी न दिख पाए
जो मै मंजिल से भटक जाऊंगा

समेट दे ये तजुर्बे मुझमे
के सेहमने के काम आएंगे कभी
जो आज उन्ही के डर से मरा लेटा हूँ

चढ़ा दो कफ़न नजरियों के
गिरा के ताबूत में जिंदगी की
कहोगे जिन्दा रहना है यही

और फिर
और फिर क्या
कुछ नहीं

ईट सटा ईट, ताबूत सटा ताबूत
बनाओ गे पिरामिड समाज का
के ये मजार है वजूद इंसान का

असमानता ढांचे में है,
हर कोई इसे है जनता
पर अपनी ईट हिलाने को कोई नहीं है मानता

जो थूकता है ऊपरी मंजिल से कोई
निचे वाला उसी को आपस में बाटता
फिर कहते ये नियम है न इसे कभी टालना

कभी गुस्से में थूकता हूँ ऊपर भी
वो गिरता वापस आ हम पर ही
फिर कहते है देखो कुदरत भी चाहती है यही

और फिर
और फिर क्या
कुछ नहीं

मैंने अपनी ईट खीच ली

Thursday, February 5, 2015

रूह की जिद

काल्पनिक दोस्त थे वो
             जैसे रखो वैसे रहते थे वो
हम उनकी जुबां अपनी
             जुबां से बाटते थे
जी वो खिलोने थे
             खेलने के काम आते थे

ये बचपन की आदतें
             बड़ी ख़राब है
जो जिधर भी देखूं
             तो अब भी सब अपने
                       खिलौने ढूंढ रहें है
के टूट रहे है
             या तोड़ रहे है

सब बोलते तो हैं
           पर क्या बोलना है क्या नहीं?
                       ये अभी भी सीख रहे हैं
हाँ आज भी अपनी जुबान
               बाटने पे अड़े हुए हैं

बस लगता है
              के चलना सीख गए है
                          आँखों की पुतलियाँ खीच के झाकना`
तो अपने कुँए में गिरे हुए हैं
             सम्हलना सीख रहे है

ये कैसी हालत है 
             कैसी बेकसी
बस इनके जिस्म बढ़े है
             रूह छोटी

वो फुदकती है
             गिर जाती है
ये रपाट खीच के मारते है
             वो रोती है,
पर हर बार आंसू पोछ कर
             फिर वही जिद करती है

"गोदी चढ़ना है, कोई तो उठा लो "




पिछत्तर प्रतिशत जला आदमी

एक वो रात थी
           जब खुदा ने फरियाद में उसे भेजा
           उतरते उतरते काबुल का एक हिस्सा राख हो गया

उसने जिस दिन
          अपनी पहली नमाज पढ़ी थी फरियाद भरी थी
          खुदा ने उसके अब्बु को सहादत मुकम्मल करी

हाँ वो दिन भी आया
          जब अल्फाज और गोलियाँ दोनों साथ उसकी हथेली चढ़ी
          जिंदगी बनाने की उम्र से पहले, उसने जिंदगी थी ले ली

फिर कल रात
          एक ड्रोन स्ट्राइक में वो बारूद में लिपट गया
           मेरे आँगन आ लेटा, डॉक्टर साहब बोले वो पिछत्तर प्रतिशत जल गया

इसमें नया क्या था
           अंदर की उबाल, अब छालों के हुबाब हो चुके थे
            जितना ही बचा था, उतनी ही तो जिंदगी देखि थी उसने

बाकि तो उसने
             जलने, खाक होने और राख बटोरने में
             खर्च कर दी थी

और आज सुबह
              आखरी सांस भी उसने फरियाद में उड़ा दी
              बदले में खुदा ने, उस फरियाद को पकड़ उसकी रूह खीच ली



         

इजहार

खाली कागज पे
                 बस थी एक दस्तख़त

कुछ ऐसी थी वो
                इजहारे मौहब्बत

इस्तीफा, गवाही
               ऐलान, रेहमत

जो भी हों
               लिख दो किस्मत

देख यूँ
               उनकी ये हिम्मत

मै महिनों तक कलम उठा ना सका
मै खुद को खुदा बना ने सका

जो भी हुआ मुझसे
              उस कागज पे

चार सिकुड़न में लपेट
              मै लौटे आय

              मै एक शायर को लूटा आया
              मै उसको नज्म बना आया




Tuesday, February 3, 2015

आवाजों की दुनीया

कभी आँखे बंद कर
             आवाजों से ये जहाँ देखना
शोर, हल्लों, झगड़ों की
             परतें उचाड़ कर देखना
कुछ मिले तो उसे
             पहचान कर देखना

एक चिड़िया चीख रही होगी
            किसी का पेट भरने को
जो उसे भी बस आवाज का सहारा है

ये शहर गुर्राता सा लगेगा
             चोट खाए कुत्ते की तरह
जो दूर बन रही बिल्डिंग की सलाखें घोपी जा रही है

कुछ कीड़े दिन को भी जागते है
             बकबकाते है
ना जाने किस्से क्या कहते है

हर कोनो से ठोकर खाती इन हवाओं की
             सिसकिया सुनाई देंगी
जो इन्हे दर्द तो है पर जिस्म पे निशान नहीं है

और अगर फिर भी कुछ ना सुनाई दे तो

अपने रागों को थर्राती धड़कनो को सुन्ना
उछलते दिल की नाकाम तदबीरों को सुन्ना
के कब से जकड रखा है इसे सीने की कैद में

ये जहाँ मुमकिन है
               आँखों के अंधेरों में
 नजरों के पर्दों के पीछे
                जब सिमटी आवाजे
मेरे ख्यालों के कंधे पे
                सर रख कर सोती है

एक सपना

ये चाहत लिए
               उम्मीद बुने
एक सपना उठ पड़ा था

ज्यादा नहीं तो
              कम ही सही
पर हिम्मत कर चला था

जेहन से जेहन
                घुमा वो
आँखों से आँखों
                चूमा वो
मंजर फिर भी उसको न मिला

नीदों से रातें
               लड़ा वो
झगड़ो की वजह
               बना वो
मंजिल फिर भी नजरों में थी ना

ठोकर खा कर जो गिरा वो
अब जा के है ये समझा

रस्ता जो ये मेरा है
थम चल कर ही काटना

उठ जा तू उठ बढ़ जा
चल चल चल चल बढ़ जा

थम जा तू थम थक जा
थक थक थक थक थक जा

सोच जरा


क्यों दूजों की परछाईं ढुढ़े तू
क्यों इतनी खलिश पाले है रे तू
क्यों। …

नजरों में है बस नज़ारे
नजरिये ग़ुम हैं कहाँ

तुझमे जो सपना उठा था
वो खोया है अब कहाँ

घुटने छिल कर जो खड़ा वो
मरहम मरहम को तरसा

हर मुकाम की मोड़ पे जा कर
वो अब है ये बूझा

उठ जा तू उठ बढ़ जा
चल चल चल चल बढ़ जा

थम जा तू थम थक जा
थक थक थक थक थक जा